बृहस्पति 6 अप्रैल को मकर राशि की यात्रा समाप्त करके कुंभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं, इस राशि पर ये 13 सितंबर तक गोचर करेंगे। अपनी इस यात्रा के मध्य ये 20 जून की रात्रि 8 बजकर 28 मिनट पर वक्री होंगे और उसी अवस्था में चलते हुए पुनः14 सितंबर की दोपहर 2 बजकर 28 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश कर जाएंगे। धनु और मीन राशि के स्वामी गुरु पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के भी स्वामी हैं। कर्क राशि इनकी उच्च और मकर राशि नीच संज्ञक कही गयी है।
जिन जातकों की जन्मकुंडली में ये कर्क, धनु अथवा मीन राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में रहते हैं उनके लिए 'हंस' योग का निर्माण करते हैं यदि इस योग में कोई दोष अथवा अशुभ ग्रहों का प्रभाव न हो तो ऐसा व्यक्ति सामान्य परिवार के भी जन्म लेकर धन और यश कमाता है। जीवन छोटे स्तर से कार्य करते हुए जातक जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचता है। जहां भी जाता है उसके प्रसंशको की भीड़ रहती है।
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को सर्वाधिक शुभ एवं शीघ्रफलदाई ग्रह माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में तो इन्हें आत्मा की शक्ति कहा गया है, जो प्राणियों को आत्मबोध की ज्योति प्राप्त कराकर अज्ञान के अन्धकार को दूर करते हुए जीव को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वेदों में भी कहा गया है कि, 'बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योम् । सप्तास्यस्तु विजातो रवेणविसप्तरश्मिः धमत्तमांसि। अर्थात- बृहस्पति जो सबसे महान हैं अपनी स्थिति से आकाश के उच्चतम स्तर से सभी दिशाओं से, सातों किरणों से, अपनी ध्वनि से हमें आच्छादन करने वाले अन्धकार को पूर्णतया दूर करते हैं। ये सुंदर, पीतवर्ण, बृहद शरीर, भूरेकेश वाले अपने याचकों और आराधकों को वांछित फल प्रदान करने वाले देवता है। विवाह कराना, संतान प्राप्ति, मांगलिक कार्य, तीर्थ यात्राओं, स्कूल कालेज खोलने, प्रबंधन, लेखन अध्यापन, कथा वाचन, वेदाध्ययन, आद्ध्यात्मिक कार्यों एवं शिक्षा सम्बन्धी अनेकों कार्यों में इनका विशेष योगदान और आशीर्वाद रहता है।
अगर ये आपकी कुंडली में अकारक हों, या वक्री अथवा किसी भी तरह से दोषयुक्त हों तो इनकी शान्ति करना अति उत्तम रहता है। सृजन में प्रजापिता ब्रह्मा का सहयोगी होने के फलस्वरूप इन्हें 'जीव' भी कहा गया है। जन्मकुंडली में द्वितीय, पंचम, नवम तथा एकादश भाव के कारक होते हैं। अतः इन भावों में इनकी उपस्थिति जातक को सफल और कीर्तिवान बनाती है।
अशुभ गुरु को प्रसन्न करने के सरल उपाय-
यदि गोचर बृहस्पति आपकी राशि के लिए अशुभ हैं तो, गरीब एवं ज़रूरतमंद विद्यार्थियों की मदद करें। आम, बरगद, पीपल एवं अनार का वृक्ष लगाएं। महिलाएं कार्य उन्नति एवं उत्तम दाम्पत्य जीवन के लिए बृहस्पतिवार के व्रत रखें । सभी स्त्री/पुरुष बृहस्पति का गायत्री मंत्र- ॐ अंगिरो जाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरूः प्रचोदयात् । का जप प्रतिदिन स्नान के बाद एक माला जपें ।