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इंदिरा एकादशी पर क्या है व्रत रखने की विधि, जानिए क्या करें क्या न करें और कब करें पारण

Wed, 17 Sep 2025 06:50 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Indira Ekadashi Vrat 2025: एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाती है। शास्त्रों में वर्णन है कि दशमी के दिन से ही व्रती को सात्विकता का पालन करना चाहिए। इस दिन से हीन भावनाओं, पाप कर्मों और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहना आवश्यक है।
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Indira Ekadashi 2025 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Indira Ekadashi Vrat 2025: सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है। यह व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष भर 24 एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। इसे पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए सर्वोत्तम माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पितृलोक में रहने वाले पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और व्रती को भी अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। सभी एकादशियां भगवान नारायण के समान ही पुण्यफल देने वाली होती हैं, सभी एकादशियों का महत्व अलग-अलग होता है परन्तु सभी एकादशियों को करने के नियम एक जैसे ही होते हैं।

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दशमी तिथि से प्रारंभ होते हैं नियम
एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाती है। शास्त्रों में वर्णन है कि दशमी के दिन से ही व्रती को सात्विकता का पालन करना चाहिए। इस दिन से हीन भावनाओं, पाप कर्मों और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहना आवश्यक है। भोजन में मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन, मसूर, चना, मूंग और भारी अनाज का त्याग करना चाहिए। तैलीय, मसालेदार और बासी भोजन वर्जित माना गया है। दशमी से नियमपूर्वक संयम का पालन करने पर ही व्रत का पूर्ण फल मिलता है।

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एकादशी का दिन
एकादशी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। घर में भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा शालग्राम का पूजन पीले या सफेद पुष्पों से करना चाहिए। तुलसी पत्र अर्पित करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि भगवान विष्णु तुलसी के बिना कोई भोग स्वीकार नहीं करते। इस दिन व्रती को उपवास रखना चाहिए। कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग फलाहार या केवल दूध का सेवन करते हैं।

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शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन आलस्य, क्रोध, झूठ, चुगली और परनिंदा से बचना चाहिए। दिनभर विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ, हरिनाम संकीर्तन अथवा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप विशेष फल प्रदान करता है। रात्रि में जागरण करना भी अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है।

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द्वादशी का महत्व
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि में किया जाता है, जिसे ‘पारण’ कहा जाता है। पारण सूर्योदय के बाद करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यदि द्वादशी को पारण न किया जाए, तो व्रत का फल अधूरा रह जाता है। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और भोजन से पूर्व तुलसी दल का सेवन अनिवार्य है। साथ ही, ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र अथवा धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।

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