दशमी तिथि से प्रारंभ होते हैं नियम
एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाती है। शास्त्रों में वर्णन है कि दशमी के दिन से ही व्रती को सात्विकता का पालन करना चाहिए। इस दिन से हीन भावनाओं, पाप कर्मों और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहना आवश्यक है। भोजन में मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन, मसूर, चना, मूंग और भारी अनाज का त्याग करना चाहिए। तैलीय, मसालेदार और बासी भोजन वर्जित माना गया है। दशमी से नियमपूर्वक संयम का पालन करने पर ही व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
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एकादशी का दिन
एकादशी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। घर में भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा शालग्राम का पूजन पीले या सफेद पुष्पों से करना चाहिए। तुलसी पत्र अर्पित करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि भगवान विष्णु तुलसी के बिना कोई भोग स्वीकार नहीं करते। इस दिन व्रती को उपवास रखना चाहिए। कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग फलाहार या केवल दूध का सेवन करते हैं।
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शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन आलस्य, क्रोध, झूठ, चुगली और परनिंदा से बचना चाहिए। दिनभर विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ, हरिनाम संकीर्तन अथवा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप विशेष फल प्रदान करता है। रात्रि में जागरण करना भी अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है।
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द्वादशी का महत्व
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि में किया जाता है, जिसे ‘पारण’ कहा जाता है। पारण सूर्योदय के बाद करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यदि द्वादशी को पारण न किया जाए, तो व्रत का फल अधूरा रह जाता है। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और भोजन से पूर्व तुलसी दल का सेवन अनिवार्य है। साथ ही, ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र अथवा धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।