ज्योतिष में गुरु ग्रह को बहुत ही शुभ, बुद्धि , ज्ञान और शुभता का प्रतीक ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को देवगुरु का दर्जा मिला हुआ है। यह बुद्धि, धर्म, ज्ञान, सुख, सौभाग्य, धन और विवाह के कारक ग्रह होते हैं। गुरु ग्रह की गिनती शुभ ग्रहों में होती है। गुरु ग्रह की शुभ द्दष्टि जिस भाव में पड़ती है उसमें लगातार वृद्धि और विस्तार होता है। आपको बता दें देवगुरु बृहस्पति 4 दिसंबर से वक्री अवस्था में होते हुए मिथुन राशि में गोचर कर रहेंगे। आइए जानते हैं गुरु के मिथुन राशि में गोचर करने से कुंभ राशि पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
कुंभ राशि वालों के लिए गुरु दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी ग्रह होते हैं और अब 4 दिसंबर से वक्री गुरु का गोचर अपने मित्र बुध की राशि में मिथुन में पंचम भाव में होगा। ऐसे में पंचम भाव पर बच्चों और इनके शिक्षा के संबंध में इनकी कुछ परेशानियां बढ़ सकती है। करियर में आपको कुछ अतिरिक्त जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। जो लोग नई नौकरी की तलाश हैं उनको धन प्राप्ति के कुछ अच्छे अवसर प्राप्त होंगे लेकिन कुछ विपरीत परिस्थितयों का भी सामना करना पड़ सकता है। इस दौरान जो लोग किसी तरह का व्यापार आदि करते हैं उनको सावधानी से काम करने की आवश्कता है। आपको लापरवाही भारी पड़ सकती है। खर्चों में इजाफा हो सकता है। वहीं वैवाहिक जीवन में साथी संग किसी वाद-विवाद का सामन करना पड़ सकता है।
ज्योतिष में गुरु ग्रह का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में गुरु नीच के होते हैं।
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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