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Budhwar Ke Upay: करियर में तरक्की के लिए हर बुधवार को करें ये एक काम, मिलेगा मनचाहा लाभ

Wed, 12 Mar 2025 05:45 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Budhwar Ke Upay: हिंदू धर्म में भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है, उनके आशीर्वाद से साधक के कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इतना ही नहीं उस काम के सफल होने की संभावना भी बनी रहती हैं। 
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हिंदू धर्म में भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है, उनके आशीर्वाद से साधक के कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। - फोटो : freepik
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विस्तार
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Budhwar Ke Upay: हिंदू धर्म में भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है, उनके आशीर्वाद से साधक के कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इतना ही नहीं उस काम के सफल होने की संभावना भी बनी रहती हैं। शास्त्रों में गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता का दर्जा प्राप्त है। इसका अर्थ है कि किसी भी कार्य की शुरुआत यदि गजानन की उपासना से की जाए, तो सभी विघ्न-बाधाओं से मुक्ति प्राप्त होती हैं। वहीं गणेश जी की विशेष कृपा पाने के लिए बुधवार का दिन सबसे शुभ माना गया है।

बता दें, सप्ताह का यह दिन श्री गणेश की उपासना के लिए जाना जाता है और ज्योतिष में इसका संबंध बुध ग्रह से जोड़ा गया है। अगर बुधवार के दिन गणेश पूजन के साथ-साथ दान पुण्य से जुड़े कार्य किए जाए, तो कुंडली में बुधदेव की स्थिति मजबूत होती हैं। ज्योतिषियों की मानें तो बुध बुद्धि, वाणी, कारोबार, त्वचा और मित्र का कारक ग्रह है। उनके प्रभाव से व्यक्ति की कारोबार में तरक्की होती है। ऐसे में हर बुधवार के दिन गणेश चालीसा का पाठ करना और भी कल्याणकारी साबित हो सकता है। इससे कार्यों में सफलता के योग का निर्माण होता है। आइए इसके बारे में जानते हैं...

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श्री गणेश जी की चालीसा

दोहा
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्घारे॥
कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण, यहि काला॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है।
पलना पर बालक स्वरुप है॥
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा।
बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वन दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥
श्री गणेश यह चालीसा।
पाठ करै कर ध्यान॥
नित नव मंगल गृह बसै।
लहे जगत सन्मान॥

दोहा
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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