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Parshuram Jayanti 2020: जानिए परशुराम ने क्यों किया 21 बार क्षत्रिय वंश का विनाश

Thu, 23 Apr 2020 02:24 PM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
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परशुराम - फोटो : wikipedia
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Parshuram Jayanti 2020: भगवान परशुराम की जयंती प्रति वर्ष अक्षय तृतीया के दिन मनायी जाती है। इस साल परशुराम जयंती 26 अप्रैल को है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म में परशुराम जयंती को बड़ी धूम के साथ मनाया जाता है। जगह-जगह झांकियां निकाली जाती हैं। लेकिन इस साल कोरोना वायरस के चलते परशुराम जयंती व्यापक रूप से नहीं मनाई जाएगी। आइए जानते हैं परशुराम जयंती से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।

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भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। जब उनका जन्म हुआ था तो आकाश मंडल में छह ग्रहों का उच्च योग बना हुआ था। तब उनके पिता और सप्त ऋषि में सम्मिलित ऋषि जमदग्नि को पता चल गया था कि उनका बालक बेहद पराक्रमी होगा। 

हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन ने अपने बल और घमंड के कारण लगातार ब्राह्राणों और ऋषियों पर अत्याचार कर रहा था। प्राचीन कथा और कहानियों के अनुसार एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी सेना सहित भगवान परशुराम के पिता जमदग्रि मुनि के आश्रम में पहुंचा। जमदग्रि मुनि ने सेना का स्वागत और खान पान की व्यवस्था अपने आश्रम में की। 
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मुनि ने आश्रम की चमत्कारी कामधेनु गाय के दूध से समस्त सैनिकों की भूख शांत की। कामधेनु गाय के चमत्कार से प्रभावित होकर उसके मन में लालच पैदा हो गई। इसके बाद जमदग्रि मुनि से कामधेनु गाय को उसने बलपूर्वक छीन लिया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया। 

सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने बदला लेने के लिए परशुराम के पिता का वध कर दिया और पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

भगवान परशुराम को क्रोध भी अधिक आता था। उनते क्रोध से स्वयं गणपति महाराज भी नहीं बच पाए थे। एकबार जब परशुराम भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पहुंचे, तो गणेश जी ने उन्हें उनसे मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ डाला। इस कारण से भगवान गणेश एकदंत कहलाने लगे।

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