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ज्योतिष से जानें साल 2019 में कब और कैसी फिल्मों का रहेगा दबदबा

Tue, 07 May 2019 01:40 PM IST
Madhukar Mishra भरत शर्मा, ज्योतिषविद्
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Planets affect on bollywood movies
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कोई भी फिल्म एक लम्बी मेहनत और टीम वर्क का नतीजा होती है। कई बार ऐसा होता है कि जब फिल्म की कहानी का चयन करते समय वह समसामयिक प्रतीत होती है और दर्शकों के भरपूर प्यार और स्नेह की उम्मीद बनती है। किन्तु जब फिल्म बनती है तब तक कहानी समसामयिक नहीं रहती और दर्शक नकार देते है। इन दिनों बायोपिक फिल्में समय—समय पर आ रही हैं और दर्शकों का प्यार और स्नेह प्राप्त कर रही है, किन्तु कुछ वर्षो पहले तक बायोपिक फिल्म बनाने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। इसी तरह कभी घर परिवार की कहानी की फिल्मों की लाईन लग जाती है और लगभग सभी फिल्में चल निकलती है। तो कभी ऐसा दौर आता है कि घर परिवार की फिल्मों के बारे में कोई सोच भी नहीं पाता है। कभी देश भक्ति की फिल्में खूब बनती है और सभी अच्छा कलेक्शन करती है और कभी देश भक्ति की फिल्में दर्शकों को तरसती है। क्यों कभी सामाजिक सरोकार की कमजोर कथानक पर बनी फिल्में भी चल निकलती है और कभी सामाजिक सरोकार की मजबूत कथानक की फिल्में भी असफल हो जाती है? कौन से समय कौन सी फिल्म चलेगी? अलग— अलग कहानियों का समय कैसे तय करें?

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इन सभी सवालों का जबाब ज्योतिष के आईने में चमकते सितारों के माध्यम से खोजा जा सकता है। भारत की पहली फिल्म हरीश्चन्द्र 1913 में बनी थी जो यद्यपि एक मूक फिल्म भी किन्तु फिर भी उसे पौराणिक से अधिक साहित्य पर आधारित फिल्म माना गया और लगभग इन्हीं दिनों रविन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य में नोबेल पुरस्कार मिला। यह भी कहा जा सकता है कि भारतीय फिल्मों की शुरूआत साहित्य पर आधारित फिल्म से हुई। पहली बोलती हिन्दी फिल्म आलम आरा 1931 में बनी जो कि एक ईरानी नाटक पर आधारित फिल्म थी। इसके बाद एकांकी आधारित फिल्में कुछ समय पसंद की जाने लगी। आजादी के महत्व का संकेत देने वाली और शोषण और कुरुतियों के विरूद्ध फिल्मों का दौर 1940 के दशक में था। देश आजाद होने के बाद 1950 के दशक में खुलेपन और आजादी को दर्शाने वाली फिल्में बनी।

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Planets affect on bollywood movies - फोटो : social media
ऐसा नहीं है कि हमेशा समसामयिक घटना के आधार पर फिल्म बनती हो और चलती हो। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि पहले फिल्म बने और बाद में वैसा ही दौर चल पड़े जैसे हरीश्चन्द्र फिल्म के बाद में रविन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला था, किन्तु ज्योतिष के आधार पर उस समय भारत में साहित्य के उत्थान का समय था, जिससे वह अपने आप समसामयिक हो जाती है। ‘दो आंखें बारह हाथ’ फिल्म पहले रिलीज हुई और खुली जेल की व्यवस्था बाद में समसामयिक लगने लगी। अभी कुछ समय पहले उरी फिल्म आई और उसी दौरान एयर स्ट्राईक होने से वह अपने आप समसामयिक बन गई जिससे वह फिल्म खूब चली।

सरल शब्दों में कहे तो आने वाला समय फिल्मों के लिये कैसा रहेगा यह अगर पहले से पूर्वानुमान लग सके तो फिल्म की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। इसलिये फिल्म के बनने से रिलीज के समय के तक फिल्म के सितारों के साथ उस समय गोचर के सितारे क्या बोल रहे है यह जानना भी जरूरी हो जाता है। 

Planets affect on bollywood movies
ज्योतिष के नजरिये से फिल्म की कहानी पर सर्वाधिक प्रभाव गुरु और शनि का पड़ता है। गुरु एक वर्ष तक एक राशि में रहता है और शनि ढाई वर्ष तक एक राशि में रहता है। गुरु के असर से फिल्मों से उत्पन्न संदेश की स्थिति प्रभावित होती है। जब गुरु बलवान होता है तो उन दिनों में संदेश प्रधान फिल्में दर्शकों द्वारा पसंद की जाती है। शनि की स्थिति से उसमें सामाजिक सरोकार के तत्व की मात्रा तय होती है।

इसी तरह सूर्य और चन्द्र के द्वारा समसामयिक विषयों पर बनी फिल्मों की सफलता और असफलता तय होती है। मंगल की स्थिति से ऐक्शन की मांग और बुध की स्थिति से नवीन प्रयोग की फिल्में सफल या असफल होती देखी जाती है। इसी तरह राहु व केतु की स्थिति से डरावनी व सस्पेंस प्रधान फिल्में और शुक्र की स्थिति से प्रेम प्रसंग एवं वैभव की फिल्मों की तरफ दर्शकों का रुख प्रभावित होता देखा जाता है।

गोचर के सितारों की जैसी स्थिति चल रही होता है, उस समय उन सितारों के अनुकूल कहानी वाली फिल्म अधिक सफल होती देखी जाती है। जिन फिल्मकारों की कहानी अनायास या सोची समझी योजना के अनुसार किसी समय विशेष पर ग्रहों के अनुकूल होती है उनकी सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है और जिनकी फिल्में समय विशेष पर गोचर के ग्रहों के अनुकूल कहानी वाली नहीं होगी उनकी सफलता में कमी आती है

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एक फिल्म जब सफल होती है तो उससे जुड़ी टीम को भी पैसा और शोहरत मिलती है। अनुभव से देखा गया है कि भाग्य के धनी फिल्मकार, कलाकार के साथ ऐसा संयोग बैठता है कि उनकी फिल्में और उनकी कहानियां ग्रहों के समयानुकूल अपने आप हो जाती है। किन्तु जब इनका भाग्य साथ छोड़ चुका होता है, तो वह ग्रहों की स्थिति के विपरीत स्वभाव की फिल्में बनाने लगते है।

फरवरी 1961 में शनि के मकर राशि में आने से लेकर अप्रैल 1966 में शनि के कुंभ राशि में रहने तक देश भक्ति फिल्में दर्शकों द्वारा खूब पसंद की गई। गुरू के उच्च का होने से 1967 में उपकार जैसी संदेश प्रधान फिल्म कालजयी बनी। अमिताभ बच्चन की फिल्म जंजीर जब 11 मई 1973 को रिलीज हुई तो उस समय सूर्य उच्च का था और गुरू नीच का था, शुक्र स्वराशि वृषभ में शनि के साथ था, मंगल कुंभ राशि और राहु-केतु नीच के थे साथ ही वह समय एकल नायक प्रधान और मारधाड़ फिल्म का था। जून 1973 में शनि के मिथुन राशि में जाने से दोहरे नायक वाली फिल्में अधिक देखी जाने लगी जिनमें शोले, चुपके-चुपके सम्मिलित है। फिर आया घर परिवार की फिल्मों का दौर, जब तक ग्रह सितारें साथ दे रहे थे मजबूत और कमजोर कथानक पर बनी अधिकतर फिल्में चल रही थी किन्तु जब इस तरह की फिल्मों के ग्रह सितारों ने साथ छोड़ दिया तो दर्शकों ने भी इस तरह की फिल्मों से दूरी बनानी प्रारम्भ कर दी।
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हम आपके है कौन फिल्म 5 अगस्त 1994 को रिलीज हुई उस समय शुक्र नीच का था, इसलिये प्रेम में त्याग की कहानी होने के कारण दर्शकों के सर चढ़ कर बोली। इस सदी के प्रारम्भ में प्रयोगवादी फिल्मों का समय होने से ‘दिल चाहता है’, ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ से लेकर ‘थ्री ईडियट’ जैसी फिल्मों का जूनून देखने को मिला। अभी हाल ही में 26 अप्रैल 2019 को रिलीज फिल्म अवेंजर्स एंडगेम के समय सूर्य और शुक्र उच्च के होने से सुपरहीरो और वैभव प्रधान फिल्म का समय था और परिणाम आपके सामने है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि ग्रह गोचर के साथ तालमेल लेकर चलने वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर वाहवाही लूटती हैं।

आने वाले समय की फिल्मों की बात करें तो यह पाते है कि 2019 के शेष समय अलग-अलग कहानियों वाली फिल्में चलेगी जिनकी भविष्यवाणी फिल्में रिलीज समय के ग्रह गोचर के आधार पर की जा सकती है। यह भी बता दें कि 24 जनवरी 2020 को शनि के मकर राशि में प्रवेश करने से लेकर 29 मार्च 2025 को कुभ राशि में बने रहने तक देशभक्ति और सामाजिक सरोकर की फिल्मों का दौर एक बार फिर से आयेगा। आने वाले समय की देशभक्ति फिल्में पहले के दौर में बनने वाली देशभक्ति वाली फिल्मों से बिल्कुल अलग होगी, क्योंकि शनि के अतिरिक्त अन्य ग्रहों की स्थिति पहले से बिल्कुल अलग है। इस दौर में स्टार्टअप आधारित, स्वरोजगार आधारित, देशहित में राजनैतिक सुधार आधारित, सरकारी अधिकारी व निजी कंपनियों में कार्यनिष्ठा जगाने वाली, कठिन सामाजिक समस्याओं का सरल हल बताने वाली फिल्में दर्शकों को बॉक्स ऑफिस तक लाने में सफल होंगी।

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