गोवत्स द्वादशी व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को धनतेरस से ठीक एक दिन पहले मनाया मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 12 नवंबर, 2020 को मनाया जाएगा। इस दिन गायों तथा उनके बछड़ों की सेवा की जाती है। यदि घर के आसपास गाय और बछड़ा नहीं मिले तब शुद्ध गीली मिट्टी से गाय तथा बछडे़ को बनाकर उनकी पूजा कि जाती है। इस व्रत में गाय के दूध से बनी खाद्य वस्तुओं का उपयोग वर्जित माना गया है। देवताओं के प्रिय कार्तिक मास में गौ की रक्षा एवं पूजन करने वालों पर सदैव श्री विष्णु की कृपा बनी रहती है।
युधिष्ठिर ने किया यह व्रत
भविष्य पुराण के अनुसार महाभारत युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से कहा-'हे जगत्पते! मेरे राज्य की प्राप्ति के लिए अठारह अक्षौहिणी सेनाएं,ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य ,शूद्र,भीष्म,द्रोण,कलिंगराज कर्ण एवं दुर्योधन आदि के मरने से मेरे ह्रदय में महान क्लेश हुआ है। अतः इन पापों से छुटकारा पाने के लिए कोई मार्ग बताएं।' इस पर श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को गायों का महत्व समझाते हुए गोवत्स द्वादशी नाम के उत्तम व्रत का पालन करने को कहा ।
इसलिए पूज्यनीय है गौमाता
गाय भगवान श्री कृष्ण को अतिप्रिय है। गौ पृथ्वी का प्रतीक है। गौ माता में सभी देवी-देवता विद्यमान रहते हैं सभी वेद भी गौओं में प्रतिष्ठित है। गाय से प्राप्त सभी घटकों में जैसे दूध,घी,गोबर अथवा गौमूत्र में सभी देवताओं के तत्व संग्रहित रहते हैं । ऐसी मान्यता है कि सभी देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ खुश करना है तो गौभक्ति-गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है। गौ माता को बस एक ग्रास खिला दो, तो वह सभी देवी-देवताओं तक अपने आप ही पहुंच जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार गौमाता के पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियां, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं।
ऐसे हुआ इस व्रत का आरंभ
गोवत्स द्वादशी के विषय में एक कथा अनुसार राजा उत्तानपाद और उनकी पत्नी सुनीति ने पृथ्वी पर इस व्रत को आरंभ किया । इस व्रत के प्रभाव से राजा-रानी को बालक ध्रुव की प्राप्ति हुई। दस नक्षत्रों से युक्त ध्रुव आज भी आकाश में दिखाई देते है । शास्त्रानुसार ध्रुव तारे को देखने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है । संतान सुख की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत शुभ फल दायक होता है।गोवत्स द्वादशी के दिन किए जाने वाले कर्मों में सात्त्विक गुणों का होना अनिवार्य है।