जिले में नहीं लग रहे नए रोजपरक उद्योग
अमर उजाला विशेष
बदायूं। जिले में नए उद्योगों की स्थापना तो दूर पहले से स्थापित उद्योग भी दम तोड़ रहे हैं। विकास को गति के साथ ही युवाओं को रोजगार मिलने वाले उद्योगों की जरूरत है। पिछले कुछ सालों में औद्योगिक आस्थान सालारपुर में स्थापित दो दर्जन उद्योग बंद हो गए हैं। बंद हो रहे उद्योगों को ऑक्सीजन देने के लिए न तो सरकार कोई प्रोत्साहन दे रही है और न ही स्थानीय जनप्रतिनिधि गंभीर हैं। नतीजन विकास की राह में जिला लगातार पिछड़ रहा है।
कई साल पहले जब आंवला रोड पर सालारपुर के पास इंडस्ट्रीयल एरिया बनाया गया तो जिले के विकास को गति मिलने की आस जगी थी। इंडस्ट्रीयल एरिया में उद्योग स्थापित करने के लिए उद्यमियों को भूमि आवंटित की गई। कारखाने लगाने के लिए बैंकों ने ऋण और सरकार ने प्रोत्साहन भी दिया। धीरे-धीरे काम को गति मिली और उद्यमियों ने यहां 42 उद्योग स्थापित किए। औद्योगिक आस्थान में सरिया फैक्ट्री, गत्ता फैक्ट्री और इंडिया मार्का हैंड पम्प बनाने का कारखाना सहित कई बड़े बजट के उद्योग भी लगे। कुछ समय तक सब कुछ ठीक ठाक चला, लोगों को रोजगार भी मिला। लेकिन समय बीतने के बाद इन उद्योगों का दम निकलने लगा। सरकार ने भी प्रोत्साहनपरक योजनाओं से हाथ खींच लिया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी गंभीरता नहीं दिखाई।
बाजार की प्रतिस्पर्धा में अधिकांश उद्योग खुद को खड़ा रखने में कामयाब नहीं हो सके। इसके साथ ही कच्चे माल का अभाव और बढ़ती उत्पादन लागत ने उद्योगों के ताबूत में कील ठोंकने का काम किया। जिले में माल ढुलाई के बेहतर संसाधनों का न होना और बिजली की किल्लत ने उद्योगों का दम ही निकाल दिया। वहीं कुछ उद्यमियों की ऋण और सब्सिडी हड़पने की नीति ने हालत खराब कर दी। इन विपरीत परिस्थितियों में एक-एक कर 22 औद्योगिक इकाईयां बंद हो गईं। जबकि बाकी की दम तोड़ने के कगार पर हैं।
बंद हो चुकी आठ इकाइयों को ऋण अदा न कर पाने पर उत्तर प्रदेश वित्त निगम कई साल पहले ही अपने कब्जे में ले चुका है, जबकि एक इकाई को प्रादेशित इंडस्ट्रीयल कार्पोरेशन ऑफ यूपी ने अपने कब्जे में ले लिया है। तीन इकाइयों के मामले न्यायालय में विचाराधीन होने से इनकी मशीनरी भी धूल फांक रही हैं। वर्तमान में कार्यरत 20 इकाइयां भी विपरीत परिस्थितियों में काम के चलते दम तोड़ने के कगार पर हैं। औद्योगिक आस्थान में काम करने वाले दर्जनों कारीगर और मजदूरों ने भी अब रोजगार के लिए दूसरे जिलों का रुख कर लिया है।
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उद्योगों के नाम पर सिर्फ आटा चक्की
उद्योगों के नाम पर जिले भर में आटा चक्कियों की भरमार है। जिला उद्योग केंद्र के आंकड़ों की मानें तो पिछले तीन साल में यहां 1644 से ज्यादा आटा चक्कियों का रजिस्ट्रेशन हुआ है। इतना ही नहीं पिछले तीन साल से सरकार ने नए उद्योग स्थापित करने के लिए कोई योजना भी नहीं भेजी। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना और प्रधानमंत्री रोजगार योजना के काम भी जिला उद्योग केंद्र से छीन लिए गए।
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बंद इकाइयों को शुरू कराने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं। दस इकाइयां ऐसी हैं जो ऋण अदा नहीं कर सकी उनको यूपीएफसी और पिकअप ने अपने अधीन ले लिया है। तीन इकाइयों के मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। कुछ इकाइयां साझेदारों में विवाद के चलते बंद हैं। हमने कई उद्यमियों को नोटिस जारी किया है। अगर वह जल्द इकाईयों में काम शुरू नहीं कराते तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।-कल्पना श्रीवास्तव, महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र
उद्योग धंधों के चौपट होने का प्रमुख कारण बड़ी रेल लाइन का न होना है। न तो सरकार और न स्थानीय जनप्रतिनिधि इसको लेकर गंभीर हैं। ब्राडगेज लाइन के बाद निश्चित ही उद्योगों को गति मिलेगी।
-जागृति गुप्ता, छात्रा
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विकास के वायदे सिर्फ चुनाव के समय होते हैं। चुनाव के बाद जनप्रतिनिधि वायदों को भूल जाते हैं। बेरोजगारों को गुमराह किया जा रहा है। उद्योग होते तो काफी युवाओं को जिले में ही काम मिल सकता था।
-सुमित मिश्रा
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अपने यहां तो कोई काम ही नहीं है। बेरोजगारी दूर करने के लिए नए उद्योगों की जरूरत है लेकिन उपेक्षित नीतियों की वजह से यहां पहले से चल रहे उद्योग भी बंद हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों से अब कोई आस नहीं है।
- नैता वर्मा, छात्रा
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युवा वर्ग रोजगार के लिए पलायन कर रहा है। विकास थम सा गया है। जहां कारखाने नहीं होंगे वहां रोजगार भी नहीं होगा। सरकार और जनप्रतिनिधियों को वायदे पूरे करने चाहिए।-राजीव गुप्ता