नई संसद का चुनाव: नये चांसलर के दौर में जर्मनी की चीन नीति में नहीं रहेगी पहले जैसी नरमी

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बर्लिन Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 18 Sep 2021 04:06 PM IST

सार

जर्मनी के मतदाता 26 सितंबर को नई संसद- बुंडेस्टाग का चुनाव करेंगे। उसके बाद बुंडेस्टाग के सदस्य नए चांसलर का चुनाव करेंगे। पर्यवेक्षकों के मुताबिक चीन को इस बात का बेसब्री से इंतजार रहेगा कि कौन अगला जर्मन चांसलर बनता है। जर्मनी के साथ फिलहाल चीन का सालाना कारोबार लगभग 251 अरब डॉलर का है। उसके अलावा जर्मनी को ईयू का सबसे प्रभावशाली सदस्य देश माना जाता है...
एंजेला मर्केल और ओलफ शोल्ज
एंजेला मर्केल और ओलफ शोल्ज - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार

जर्मनी के चुनाव में चीन के साथ उसके रिश्तों पर गंभीर चर्चा चल रही है। मौजूदा चांसलर अंगेला मैर्केल के चीन के प्रति रुख को नरम समझा जाता था। उनकी पहल पर ही ईयू ने पिछले साल के आखिर में चीन के साथ व्यापक निवेश समझौता किया था। यूरोपीय संसद की मंजूरी न मिलने के कारण अभी ये समझौता अधर में है।
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जर्मनी के मतदाता 26 सितंबर को नई संसद- बुंडेस्टाग का चुनाव करेंगे। उसके बाद बुंडेस्टाग के सदस्य नए चांसलर का चुनाव करेंगे। पर्यवेक्षकों के मुताबिक चीन को इस बात का बेसब्री से इंतजार रहेगा कि कौन अगला जर्मन चांसलर बनता है। जर्मनी के साथ फिलहाल चीन का सालाना कारोबार लगभग 251 अरब डॉलर का है। उसके अलावा जर्मनी को ईयू का सबसे प्रभावशाली सदस्य देश माना जाता है।


पर्यवेक्षकों के मुताबिक अगला चांसलर चाहे जो बने, संभावना इस बात की है कि अब जर्मनी का रुख चीन के प्रति उतना नरम नहीं रहेगा, जैसा मैर्केल के समय था। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के नेता ओलफ शोल्ज या मैर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) के नेता अरमिन लैशेट में से ही किसी एक के अगला चांसलर बनने की संभावना है। ताजा जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक एसपीडी 26 फीसदी वोटरों के समर्थन के साथ सबसे आगे है, जबकि सीडीयू को 22 फीसदी वोट मिलने का संभावना जताई गई है। ग्रीन पार्टी को 16 फीसदी वोट मिल सकते हैं।

सर्वे रूझानों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि लैशेट या शोल्ज को चांसलर बनने के लिए ग्रीन पार्टी, या पूंजीवाद समर्थक फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफडीपी) या एक साथ इन दोनों का समर्थन लेना होगा। ग्रीन और फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों ही चीन के प्रति सख्त रुख रखती हैं। जर्मनी स्थित चीन संबंधी थिंक टैंक मेरिक्स में सीनियर फेलॉ एरियाने रीमेर्स ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘चीन के मामले में लैशेट या शोल्ज का अपना नजरिया मैर्केल से ज्यादा अलग नहीं होगा। शोल्ज का चीन के साथ व्यावहारिक नजरिए से लाभदायक संवाद बनाए रखने का लंबा ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। लेकिन अगर गठबंधन में एफडीपी के नेता लिंडनर वित्त या आर्थिक मामलों के मंत्री बने या ग्रीन पार्टी की नेता एनालिना बेयरबॉक विदेश मंत्री बनीं, तो चाहे जो भी चांसलर हो, उसे चीन के प्रति अधिक आलोचनात्मक रुख अपनाना पड़ेगा।’

एक और संभावना यह है कि एसपीडी ग्रीन पार्टी और वामपंथी डाय लिंके पार्टी को लेकर सरकार बनाए। वामपंथी पार्टी को छह फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई गई है। लेकिन इस समीकरण के साथ बनी सरकार के लिए चीन नीति तय करना बेहद मुश्किल साबित होगा। बर्लिन स्थित ग्लोबल पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक थोरस्टन बेनर ने कहा- ‘ग्रीन पार्टी जर्मनी में सबसे ज्यादा चीन विरोधी पार्टी है। जबकि लेफ्ट पार्टी चीन की सबसे ज्यादा चीन समर्थक पार्टी है। इसलिए कोई नेता नहीं चाहेगा कि वह इन दोनों पार्टियों को साथ लेकर चांसलर बने।’

बेनर ने कहा- ‘हाल में मैर्केल ने अपनी विदेश नीति में बदलाव लाते हुए इंडो-पैसिफिक पर ध्यान केंद्रित किया था। नई नीति में समान सोच वाले देशों के साथ उस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने को प्राथमिकता दी गई है। अगली सरकार चाहे जो बनाए, उसको इस नीति पर कायम रहना होगा।’
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