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क्या मध्य-पूर्व में मोदी दो नावों की सवारी कर रहे हैं?

बीबीसी, हिंदी Updated Sun, 11 Feb 2018 12:57 PM IST
मोदी-अब्बास
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एक ताज महल का दौरा था, कुछ बॉलीवुड सितारों के साथ सेल्फी तस्वीरें थी और दो देशों के प्रधानमंत्रियों से एक दोस्त की तरह गले लगने की तस्वीरें थीं। पिछले महीने ही इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जब भारत आए थे तो इन दृश्यों से भारतीय अखबार पटे हुए थे। लेकिन कल यानी शनिवार को नरेंद्र मोदी इसराइल से संघर्षरत फलस्तीनी क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे और वहां के नेता महमूद अब्बास को भी गले लगाया। फलस्तीनी क्षेत्र का दौरा करने वाले मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन गए। उनका रूट भी दिलचस्प रहा। वे इसराइल होते हुए नहीं गए, बल्कि जॉर्डन गए। जॉर्डन सरकार ने उन्हें फलस्तीन जाने के लिए हेलीकॉप्टर दिया और सुरक्षा प्रदान की इसराइली वायुसेना ने और तब प्रधानमंत्री फलस्तीन के रामल्लाह शहर पहुंचे और वहां कहा कि भारत फलस्तीनियों के हितों का ख्याल रखने के पुराने वादे से बंधा हुआ है और आशा करता है कि फलस्तीन शांतिपूर्ण माहौल में एक स्वतंत्र और संप्रभु देश बनेगा। एक तरफ इसराइल से हमजोली, दूसरी तरफ फलस्तीन के संप्रभु देश बनने की कामना। भारत के इस रुख के कूटनीतिक मायने क्या हैं?
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अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार और अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मुक्तदर खान की राय

मध्य-पूर्व की जो शांति प्रक्रिया है उसकी विस्तृत जानकारी अमरीकी मीडिया और दुनिया के सभी अहम देशों के पास है। यह कोई भारत और पाकिस्तान के बीच के संघर्ष की तरह नहीं है जिसके बारे में दोनों देशों के अलावा बाकी दुनिया को विस्तार से पता नहीं है। कहने का मतलब यह है कि वैश्विक स्तर पर फलस्तीनी और इसराइली संघर्ष कोई अनजान विषय नहीं है। इसके बारे में यूरोप और अमरीका को अच्छी तरह से पता है। लोगों को पता है कि फलस्तीन के स्वतंत्र देश बनने में सबसे बड़ी बाधा वेस्टबैंक पर इसराइली पुनर्वास है। इसराइल ने पिछले दो-तीन दशक में 6 लाख यहूदियों को वेस्टबैंक में बसा दिया है। ऐसे में सबको पता है कि इसराइल की इस आक्रामक नीति के कारण फलस्तीनी स्टेट बनना कितना मुश्किल है। इसराइल और फलस्तीनियों के बारे में अमरीका में बच्चे-बच्चे जानते हैं।

फलस्तीन के स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बनने में जो सबसे अहम मुद्दा है उसके बारे में नरेंद्र मोदी ने कुछ भी नहीं कहा। मोदी ने यह नहीं बताया कि फलस्तीनी स्टेट बनेगा कैसे? 80 फीसदी जमीन पर और खासकर जहां पानी है, जहां फसलें उग सकती हैं, वो सारी जमीन इसराइली सेटलमेंट में जा रही है तो फलस्तीन बनेगा कहां? फलस्तीन के बनने में जितनी देर लगेगी उतनी है इसराइली अबादी वेस्टबैंक में सघन होती जाएगी। वेस्टबैंक पर साल 1994 में केवल एक लाख इसराइली सेटलर्स थे, लेकिन अब इनकी तादाद 6 लाख हो गई है। जो सबसे मुश्किल पक्ष है और उस पर नरेंद्र मोदी कुछ कहते तो लगता कि वो गंभीरता से कुछ कह रहे हैं। वो वही बात कह रहे हैं जो अब तक भारत की सरकारें प्रतीकात्मक रूप से कहती आ रही हैं। अब तो हमास ने भी हथियार छोड़ दिया है। शांति प्रक्रिया के तकरीबन 25 साल हो गए हैं, लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हुआ।

मध्य-पूर्व में दो नावों की सवारी वाली विदेश नीति

वैश्विक नीति में कुछ चीजे सार्वजनिक तौर पर होती हैं पर पर्दे के पीछे भी कुछ कम घटित नहीं होता है। मिसाल के तौर पर मोदी नेतन्याहू से निजी तौर पर यह भी कह देते वो उनकी थोड़ी आलोचना भी करेंगे क्योंकि यह भारत के हित में है तो कुछ बिगड़ नहीं जाता। इसराइल को ऐसी चीजों की आदत है लेकिन नरेंद्र मोदी ने वो भी नहीं किया। दुनिया भर में इसराइल विरोधी भावना बढ़ी है। इसे हम भारत में भी देख सकते हैं। अमरीका और यूरोप में भारत की जो वामपंथी आवाज है वो पूरी तरह से इसराइल के खिलाफ है। जब मैं अरब मीडिया को देख रहा था तो उसमें इसराइल के ख़िलाफ़ काफी लेफ्ट आवाज थी। अरब मीडिया में बीजेपी की इसराइल समर्थन वाली नीति की आलोचना हो रही है। अमरीका में भारतीय मूल के करीब 20 लाख लोग हैं और ये इसराइल का समर्थन करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की स्थायी प्रतिनिधि निकी हेली की टिप्पणी को देखें तो साफ पता चलता है कि वो इसराइल के समर्थन से ज्यादा प्रो-इसराइल निकी हेली है। निकी हेली भारतीय मूल की ही हैं। पिछले 5-6 सालों में भारत पाकिस्तान के बीच जो तनाव है उसके कारण अमरीका में भारतीय लॉबी बनाम मुस्लिम लॉबी हो गया है। ऐसे में भारतीय लॉबी अमरीका में यहूदी लॉबी के साथ आ गई है। यहूदी लॉबी का साथ मिलने से अमरीका में भारतीय लॉबी काफ़ी मजबूत हो गई है। ट्रंप प्रशासन में भारतीय मूल के लोगों की पहुंच बढ़ी है। अमरीका में जो भारतीय लॉबी है वो बीजेपी समर्थक है। बीजेपी और इसराइल के बीच संबंध इसलिए भी अच्छा है क्योंकि भारतीय लॉबी बीजेपी और इसराइल समर्थक है।

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