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आर्मीनिया और अजरबैजान, नागोर्नो-काराबाख को लेकर क्यों लड़ रहे हैं

बीबीसी Published by: अनिल पांडेय Updated Tue, 29 Sep 2020 06:08 PM IST
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आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच युद्ध
आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच युद्ध - फोटो : BBC Graphic

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आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच नागोर्नो-काराबाख इलाके को लेकर लगातार दूसरे दिन भीषण लड़ाई हुई। दशकों पहले से जारी इस विवाद को लेकर एक बार फिर से छिड़ी लड़ाई में सोमवार को दर्जनों लोगों के मारे जाने की खबर है।
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इस विवाद के केंद्र में नागोर्नो-काराबाख का पहाड़ी इलाका है जिसे अजरबैजान अपना कहता है, हालांकि 1994 में खत्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाके पर आर्मीनिया का कब्जा है। 1980 के दशक से अंत से 1990 के दशक तक चले युद्ध के दौरान 30 हजार से अधिक लोगों को मार डाल गया और 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए थे।


उस दौरान अलगावादी ताकतों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाकों पर कब्जा जमा लिया, हालांकि 1994 में युद्धविराम के बाद भी यहां गतिरोध जारी है। सोमवार रात नागोर्नो-काराबाख के अधिकारियों ने कहा कि लड़ाई में उनकी सेना के 26 और लोग मारे गए हैं जिसके बाद मरने वालों की कुल संख्या 80 तक पहुंच गई है।

इस विवाद को लेकर अब चिंता जताई जा रही है कि इसमें तुर्की, रूस और ईरान भी कूद सकते हैं। इस इलाके से गैस और कच्चे तेल की पाइपलाइनें गुजरती है इस कारण इस इलाके के स्थायित्व को लेकर जानकार चिंता जता रहे हैं।

फिर छिड़ा युद्ध
एक दूसरे पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाने के बाद रविवार को आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया। इसके बाद दोनों पक्षों ने कहा कि उन्होंने सीमा पर सैनिकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है और कई इलाकों में मार्शल लॉ लगा दिया है। इससे पहले यहां साल 2016 में भी भीषण लड़ाई हुई थी जिसमें 200 लोगों की मौत हुई थी।

क्या है ताजा जानकारी?
नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों के अनुसार रविवार को यहां 16 लोगों की मौत हुई थी जबकि सौ से अधिक लोग घायल हुए थे। वहीं समाचार एजेंसी इंटरफैक्स ने अर्मीनियाई अधिकारियों को ये कहते बताया है कि वहाँ अब तक दो सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं।

और अजरबैजान में अधिकारियों का कहना है कि रविवार को कुछ लोगों की मौत हुई है जबकि तीस से अधिक घायल हुए हैं। नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों ने दावा किया है कि रविवार को जिन इलाकों पर अजरबैजान के सैनिकों ने कब्जा किया था उन्हें फिर छुड़ा लिया गया है।

वहीं अजरबैजान सरकार ने सोमवार को कहा है कि विवादित इलाके में रणनीतिक तौर पर अहम कुछ जगहों को उनकी सेना ने कब्जे में ले लिया है। जुलाई में सीमा पर हुई हिंसा में 16 लोगों की मौत के बाद अजरबैजान में व्यापक प्रदर्शन हुए थे। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि इस इलाके को देश अपने कब्जे में ले।

क्यों लड़ रहे हैं आर्मीनिया और अजरबैजान?
पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके आर्मीनिया और अजरबैजान नागोर्नो-काराबाख के इलाके को लेकर 1980 के दशक में और 1990 के दशक के शुरूआती दौर में संघर्ष कर चुके हैं। दोनों ने युद्धविराम की घोषणा भी की लेकिन सही मायनों में शांति समझौते पर दोनों कभी सहमत नहीं हो पाए।

दक्षिणपूर्वी यूरोप में पड़ने वाली कॉकेशस के इलाके की पहाड़ियां रणनीतिक तौर पर बेहद अहम मानी जाती हैं। सदियों से इलाके की मुसलमान और ईसाई ताकतें इन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती रही हैं।

1920 के दशक में जब सोवियत संघ बना तो अभी के ये दोनों देश - आर्मीनिया और अजरबैजान - उसका हिस्सा बन गए। ये सोवियत गणतंत्र कहलाते थे। नागोर्नो-काराबाख की अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है लेकिन सोवियत अधिकारियों ने उसे अजरबैजान के हाथों सौंप दिया।

इसके बाद दशकों तक नागोर्नो-काराबाख के लोगों ने कई बार ये इलाका आर्मीनिया को सौंपने की अपील की। लेकिन असल विवाद 1980 के दशक में शुरू हुआ जब सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ और नागोर्नो-काराबाख की संसद ने आधिकारिक तौर पर खुद को आर्मीनिया का हिस्सा बनाने के लिए वोट किया।

इसके बाद यहां शुरू हुए अलगाववादी आंदोलन को अजरबैजान ने खत्म करने की कोशिश की। हालांकि, इस आंदोलन को लगातार आर्मीनिया का समर्थन मिलता रहा। नतीजा ये हुआ कि यहां जातीय संघर्ष होने लगे और सोवियत संघ से पूरी तरह आजाद होने के बाद एक तरह का युद्ध शुरू हो गया।

यहां हुए संघर्ष के कारण लाखों लोगों को अपना घर छोड़ कर पलायन करना पड़ा। दोनों पक्षों की तरफ़ से जातीय नरसंहार की खबरें भी आईं। साल 1994 में रूस की मध्यस्थता में युद्धविराम की घोषणा से पहले नागोर्नो-काराबाख पर आर्मीनियाई सेना का कब्जा हो गया।

इस डील के बाद नागोर्नो-काराबाख अजरबैजान का हिस्सा तो रहा लेकिन इस इलाके पर अलगाववादियों की हूकूमत रही जिन्होंने इसे गणतंत्र घोषित कर दिया। यहां आर्मीनिया के समर्थन वाली सरकार चलने लगी जिसमें आर्मीनियाई जातीय समूह से जुड़े लोग थे। इस डील के तहत नागोर्नो-काराबाख लाइन ऑफ़ कॉन्टैक्ट भी बना, जो आर्मीनिया और अजरबैजान के सैनिकों को अलग करता है।

इस इलाके में शांति बनाए रखते के लिए 1929 में फ्रांस, रूस और अमरीका की अध्यक्षता में बनी ऑर्गेनाइजेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप मिंस्क ग्रुप की मध्यस्थता में शांति वार्ता जारी है लेकिन अब तक किसी समझौते तक पहुंचा नहीं जा सका है।

बीते तीन दशक से यहां रह रह कर तनाव गहरा जाता है और झड़पें भी होती हैं। भौगोलिक और रणनीतिक तौर पर अहम होने के कारण भी ये विवाद जटिल हो गया है।

अजरबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं। ऐसे में नैटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अजरबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया। अजरबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कह दिया।

आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं। 1993 में जब आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अजरबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी।

ताजा विवाद गहराया तो तुर्की एक बार फिर अपने मित्र के समर्थन में आ गया। वहीं आर्मीनिया के रूस के साथ गहरे संबंध हैं। यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन के सदस्य हैं।

हालांकि, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अजरबैजान के साथ भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते हैं और उन्होंने दोनों देशों से युद्धविराम की अपील की है।

साल 2018 में आर्मीनिया में लंबे वक्त से गद्दी पर रहे शेर्ज सार्गिसान के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रद्रर्शन हुए। इसके बाद इसी साल हुए निष्पक्ष चुनाव में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे निकोल पाशिन्यान को प्रधानमंत्री चुन लिया गया।

इसके बाद हुई बातचीत में पाशिन्यान और अजरबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीव के बीच सीमा पर तनाव कम करने और दोनों देशों के बीच पहली मिलिटरी हॉटलाइन शुरू करने पर सहमति बनी। साल 2019 में दोनों देशों ने एक बयान जारी कर कहा कि इस इलाके में शांति स्थापित करने के लिए दोनों देशों को कारगर कदम उठाने की जरूरत है।

हालांकि अब तक ऐसा कुछ होता नजर नहीं आया है। अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि ताजा तनाव की शुरूआत किसने की है, हालांकि जुलाई के बाद के महीनों से लगातार इस इलाके में तनाव अपने चरम पर था।
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