अमर उजाला
Tue, 11 February 2025
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ।।
इसका अर्थ है कि हमें जीवन में कभी भी उन लोगों से दोस्ती नहीं रखनी चाहिए, जो मुंह पर मीठे बनते हैं
परंतु पीठ पीछे हमारा काम बिगाड़ते हैं
आचार्य चाणक्य के अनुसार जीवन में ऐसे लोगों को उस घड़े की तरह छोड़ देना चाहिए
जिसके मुंह पर दूध है, परंतु अंदर विष भरा हुआ है
जीवन में हमेशा याद रखें आचार्य चाणक्य की ये एक बात