पौराणिक कथाओं के अनुसार महाशिवरात्रि का पावन पर्व, तीन कारणों से मनाया जाता है।
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पहला कारण ये है कि माता पार्वती के कठोर तप के बाद जब भगवान शिव विवाह के लिए राजी हुए थे, तब भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के दिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पड़ी थी।
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इस तिथि को हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती के महामिलन के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि के दिन महादेव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।
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दूसरा कारण ये है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव अपने शिवलिंग स्वरूप में प्रकट हुए थे। इस दिन से ही पहली बार भगवान विष्णु और ब्रह्मदेव उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की थी।
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वहीं तीसरी मान्यता के अनुसार जब असुर और देवताओं के बीच समुद्र मंथन हुआ था तब पहली बार में विष था। उस विष को पीने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं था, इसलिए पूरी सृष्टी को बचाने के लिए भगवान शिव ने विष का पान किया था।
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जिस दिन भगवान शिव ने विष पान किया था, उस दिन महाशिवरात्रि यानी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पड़ी थी। विष पान के बाद शिव जी का गला नीला पड़ गया था, जिसके बाद उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना गया।