अमर उजाला
Sat, 15 July 2023
कन्या दान का तात्पर्य होता है अपनी कन्या किसी और को देना
हालांकि वेदों में इसका जिक्र नहीं मिलता है, क्योंकि वेदों में कभी भी पुरुषों और महिलाओं में कोई अंतर नहीं किया जाता था
वेदों के समय में स्त्री और पुरुष दोनों को एक सामान ही समझा जाता था
मनुस्मृति के समय से कन्यादान की प्रथा का आरंभ हुआ
आइए जानते हैं कि कन्यादान को महादान क्यों कहा जाता है
मनु स्मृतियों का आरंभ हुआ तब उसमें 8 तरह की शादियों का वर्णन किया गया, इसमें सर्वप्रमुख ब्रह्म विवाह होता था
मनुस्मृति के समय समाज पुरुष प्रधान था और स्त्रियां पुरुषों पर निर्भर होती थीं
इसी वजह से यह नियम बना कि पिता किसी सुयोग्य वर का चयन करके अपनी कन्या का दान करेगा
सर्वप्रथम दक्ष प्रजापति ने अपनी कन्याओं के विवाह में कन्यादान की प्रथा निभाई थी
यदि कोई लक्ष्मी का दान करता है तो वह अपनी सुख समृद्धि का दान भी कर देता है तो इसी वजह से कन्यादान को महादान माना जाता है
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