पौराणिक कथा के अनुसार एक बार स्वर्ग के नंदन वन में देवताओं ने एक उत्सव का आयोजन किया। इस उत्सव में सभी ऋषियों को भी आमंत्रित किया गया था।
Image Credit : iStock
इस उत्सव में गन्धर्वों और गंधर्व कन्याओं द्वारा नृत्य और गायन का कार्यक्रम हुआ। उत्सव के दौरान अचानक पुष्यवती नामक एक नृत्यांगना का ध्यान माल्यवान नाम के एक गंधर्व पर पड़ा और वह उसे पसंद आया। फिर दोनों एक दूसरे को निहारने लगे।
Image Credit : iStock
पुष्यवती और माल्यवान एक दूसरे को देखने में खो गए कि उन्हें इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि वे उत्सव में मौजूद हैं और दोनों अपनी मर्यादा लांघ कर पास आ गए।
Image Credit : iStock
इसके बाद इंद्रदेव ने पुष्यवती और माल्यवान को श्राप दिया कि वह पिशाच योनि में भटकेंगे और उन्हें स्वर्ग में अब से कोई जगह नहीं मिलेगी।
Image Credit : iStock
इसके बाद वे दोनों हिमालय की श्रृंखलाओं में मुक्ति पाने के लिए पिशाच के रूप में भटकने लगे। दोनों को अपनी गलती का पछतावा हुआ।
Image Credit : iStock
फिर नारद मुनि ने उन्हें बताया कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन व्रत कर भगवान विष्णु का ध्यान कर लें।
Image Credit : iStock
इससे उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल जाएगी। इसके बाद पुष्यवती और माल्यवान ने उनके कहने पर इस तिथि पर व्रत रखा और विधिवत पूजा-अर्चनी की, जिससे उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिली।
Image Credit : iStock
यही वजह है कि जया एकादशी के दिन पिशाच योनि में भटक रहे लोगों को मुक्ति मिल जाती है और साथ ही पितरों को भी सुखों की प्राप्ति होती है।
Image Credit : iStock
तरक्की के लिए आज गुप्त नवरात्रि की महाष्टमी पर कपूर से करें ये उपाय