श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी

अमर उजाला

Sun, 26 February 2023

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एक दिन श्री कृष्ण ने देखा कि सभी ब्रजवासी पकवान बना रहे हैं, पूजा का मंडप सजाया जा रहा है और सभी लोग प्रातःकाल से ही पूजन की सामाग्री एकत्रित करने में व्यस्त हैं
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तब श्री कृष्ण ने योशदा माता से पूछा, ''मईया'' ये आज सभी लोग किसके पूजन की तैयारी कर रहे हैं, इस पर मईया ने कहा कि इंद्रदेव वर्षा करते हैं और जिससे अन्न की पैदावार अच्छी होती है इसलिए सभी ब्रजवासी इंद्र देव के पूजन की तैयारी कर रहे हैं

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तब श्री कृष्ण ने कहा कि वर्षा करना तो इंद्रदेव का कर्तव्य है यदि पूजा करनी है तो हमें गोवर्धन पर्वत की करनी चाहिए, क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं और हमें फल-फूल, सब्जियां आदि भी गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होती हैं
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इसके बाद सभी ब्रजवासी इंद्रदेव की बजाए गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे, इस बात को देवराज इंद्र ने अपना अपमान समझा और क्रोध में आकर प्रलयदायक मूसलाधार बारिश शुरू कर दी

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जिससे हर ओर त्राहि-त्राहि होने लगी सभी अपने परिवार और पशुओं को बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, भगवान कृष्ण ने इंद्रदेव का अंहकार दूर करने और सभी ब्रजवासियों की रक्षा करने हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया

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सभी ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली, इसके बाद इंद्रदेव को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने श्री कृष्ण से क्षमा याचना की इसी के बाद से गोवर्धन पर्वत के पूजन की परंपरा आरंभ हुई

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