जब आप सफ़र पर जाते हैं तो विद्यार्जन ही आपका मित्र है. घर में पत्नी मित्र है. बीमार होने पर दवा मित्र है. अर्जित पुण्य मृत्यु के बाद एकमात्र मित्र है.
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समुद्र में होने वाली वर्षा व्यर्थ है. जिसका पेट भरा हुआ है उसके लिए अन्न व्यर्थ है. पैसे वाले आदमी के लिए भेंट वस्तु का कोई अर्थ नहीं. दिन के समय जलता दिया व्यर्थ है.
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वर्षा के जल के समान कोई जल नहीं. खुद की शक्ति के समान कोई शक्ति नहीं. नेत्र ज्योति के समान कोई प्रकाश नहीं. अन्न से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं.
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सत्य की शक्ति ही इस दुनिया को धारण करती है. सत्य की शक्ति से ही सूर्य प्रकाशमान है, हवाएं चलती हैं, सही में सब कुछ सत्य पर आश्रित है.
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लक्ष्मी जो धन की देवी हैं, वो चंचला हैं. हमारी श्वास भी चंचला है. हम कितना समय जियेंगे इसका कोई ठिकाना नहीं. हम कहां रहेंगे यह भी पक्का नहीं. कोई बात यहां पर पक्की है तो यह है की हमारा अर्जित पुण्य कितना है.
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ये सब आपके पिता हैं-जिसने आपको जन्म दिया, जिसने आपका यज्ञोपवित संस्कार किया, जिसने आपको पढ़ाया, जिसने आपको भोजन दिया, जिसने आपको भयपूर्ण परिस्थितियों में बचाया.