मेरी नजरों में वह आदमी मृत है जो जीते जी धर्म का पालन नहीं करता. लेकिन जो धर्म पालन में अपने प्राण दे देता है वह मरने के बाद भी बेशक लम्बा जीता है.
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जिस व्यक्ति ने न ही कोई ज्ञान संपादन किया, ना ही पैसा कमाया, मुक्ति के लिए जो आवश्यक है उसकी पूर्ति भी नहीं किया. वह एक निहायत बेकार जिंदगी जीता है जैसे के बकरी की गर्दन से झूलने वाले स्तन.
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जो नीच लोग होते है वो दूसरे की कीर्ति को देखकर जलते है. वो दूसरे के बारे में अपशब्द कहते हैं क्योंकि उनकी कुछ करने की औकात नहीं है.
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यदि विषय बहुत प्रिय है तो वो बंधन में डालते है. विषय सुख की अनासक्ति से मुक्ति की और गति होती है. इसीलिए मुक्ति या बंधन का मूल मन ही है.
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जो आत्म स्वरूप का बोध होने से खुद को शरीर नहीं मानता, वह हरदम समाधि में ही रहता है भले ही उसका शरीर कही भी चला जाए.
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किस को सब सुख प्राप्त हुए जिसकी कामना की. सब कुछ भगवान् के हाथ में है. इसलिए हमें संतोष में जीना होगा.
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जिस प्रकार एक गाय का बछड़ा, हजारो गायों में अपनी माँ के पीछे चलता है उसी तरह कर्म आदमी के पीछे चलते हैं.