तात, यदि तुम जन्म मरण के चक्र से मुक्त होना चाहते हो तो जिन विषयों के पीछे तुम इन्द्रियों की संतुष्टि के लिए भागते फिरते हो उन्हें ऐसे त्याग दो जैसे तुम विष को त्याग देते हो. इन सब को छोड़कर हे तात तितिक्षा, ईमानदारी का आचरण, दया, शुचिता और सत्य इसका अमृत पियो.
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एक संयमित मन के समान कोई तप नहीं. संतोष के समान कोई सुख नहीं. लोभ के समान कोई रोग नहीं. दया के समान कोई गुण नहीं.
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हम अपना हर कदम फूंक फूंक कर रखें. हम छाना हुआ जल पिएं. हम वही बात बोलें जो शास्त्र सम्मत हैं. हम वही काम करें जिसके बारे में हम सावधानीपूर्वक सोच चुके हैं.
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इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि व्यक्ति उन बातों के प्रति अनुदगार रहता है जिसका उसे कोई ज्ञान नहीं. उसी प्रकार जैसे एक जंगली शिकारी की पत्नी हाथी के सिर का मणि फेंककर गूंजे की माला धारण करती है.
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यह बातें एक बार ही होनी चाहिए- राजा का बोलना, विद्वान व्यक्ति का बोलना, लड़की का ब्याहना.
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वह पत्नी जो पर पुरुष में रूचि रखती है, उसके लिए उसका पति ही उसका शत्रु है.