मन में सोचे हुए कार्य को किसी के सामने प्रकट न करें बल्कि मननपूर्वक उसकी सुरक्षा करते हुए उसे कार्य में परिणत कर दें.
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जब आपका शरीर स्वस्थ है और आपके नियंत्रण में है उसी समय आत्मसाक्षात्कार का उपाय कर लेना चाहिए क्योंकि मृत्यु हो जाने के बाद कोई कुछ नहीं कर सकता है.
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सोने की परख उसे घिसकर, काटकर, गरमकर और पीटकर की जाती है. उसी तरह व्यक्ति का परीक्षण वह कितना त्याग करता है, उसका आचरण कैसा है, उसमें गुण कौन से हैं और उसका व्यवहार कैसा है इससे होता है.
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वह आदमी अभागा है जो अपने बुढ़ापे में पत्नी की मृत्यु देखता है. वह भी अभागा है जो अपनी सम्पदा संबंधियों को सौंप देता है. वह भी अभागा है जो खाने के लिए दूसरों पर निर्भर है.
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एक पंडित भी घोर कष्ट में आ जाता है यदि वह किसी मूर्ख को उपदेश देता है, यदि वह एक दुष्ट पत्नी का पालन-पोषण करता है या किसी दुखी व्यक्ति के साथ अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध बना लेता है.
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दुष्ट पत्नी, झूठा मित्र, बदमाश नौकर और सर्प के साथ निवास साक्षात् मृत्यु के समान है