ऐसे हो जाती है आपकी दौलत बेकार

अमर उजाला

Tue, 10 May 2022

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जो व्यक्ति अपने घर के लोगों से बहुत आसक्ति रखता है वह भय और दुःख को पाता है. आसक्ति ही दुःख का मूल है. जिसे सुखी होना है उसे आसक्ति छोड़नी पड़ेगी.

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एक हाथ की शोभा गहनों से नहीं दान देने से है. चन्दन का लेप लगाने से नहीं जल से नहाने से निर्मलता आती है. एक व्यक्ति भोजन खिलाने से नहीं सम्मान देने से संतुष्ट होता है. मुक्ति खुद को सजाने से नहीं होती, अध्यात्मिक ज्ञान को जगाने से होती है.

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जिसका ज्ञान किताबों में सिमट गया है और जिसने अपनी दौलत दूसरों के सुपुर्द कर दी है वह जरुरत आने पर ज्ञान या दौलत कुछ भी इस्तेमाल नहीं कर सकता.

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यह मधुमक्खी जो कमल की नाजुक पंखड़ियों में बैठकर उसके मीठे मधु का पान करती थी, वह अब एक सामान्य कुटज के फूल पर अपना ताव मारती है. क्योंकि वह ऐसे देश में आ गई है जहां कमल है ही नहीं, उसे कुटज के पराग ही अच्छे लगते हैं.

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कोकिल तब तक मौन रहते हैं. जबतक वो मीठा गाने की क़ाबलियत हासिल नहीं कर लेते और सबको आनंद नहीं पहुंचा सकते.

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देखिये क्या आश्चर्य है? बड़े लोग अनोखी बातें करते हैं. वे पैसे को तो तिनके की तरह मामूली समझते हैं लेकिन जब वे उसे प्राप्त करते हैं तो उसके भार से और विनम्र होकर झुक जाते हैं.

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एक दुर्जन और एक सांप में अंतर

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