यदि आप दिव्यता चाहते हैं तो आपके वाचा, मन और इन्द्रियों में शुद्धता होनी चाहिए. उसी प्रकार आपके ह्रदय में करुणा होनी चाहिए.
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जिस प्रकार एक फूल में खुशबू है. तिल में तेल है. लकड़ी में अग्नि है. दूध में घी है. गन्ने में गुड़ है. उसी प्रकार यदि आप ठीक से देखते हो तो हर व्यक्ति में परमात्मा है.
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उस यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं जिसके उपरांत लोगों को बड़े पैमाने पर भोजन ना कराया जाए. ऐसा यज्ञ राज्यों को ख़त्म कर देता है.
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यदि पुरोहित यज्ञ में ठीक से उच्चारण ना करे तो यज्ञ उसे ख़त्म कर देता है और यदि यजमान लोगों को दान एवं भेटवस्तु ना दे तो वह भी यज्ञ द्वारा ख़त्म हो जाता है.
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गरीबी पर धैर्य से मात करें. पुराने वस्त्रों को स्वच्छ रखें. बासी अन्न को गर्म करें. अपनी कुरूपता पर अपने अच्छे व्यवहार से मात करें.
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एक विद्यार्थी पूर्ण रूप से निम्नलिखित बातों का त्याग करे-काम, क्रोध, लोभ, स्वादिष्ट भोजन की अपेक्षा, शरीर का शृंगार, अत्याधिक जिज्ञासा, अधिक निद्रा, शरीर निर्वाह के लिए अत्याधिक प्रयास.