एक ऐसी मस्जिद जिसमें अरबी में लिखी आयतों का संस्कृत में अनुवाद है

अमर उजाला

Tue, 17 May 2022

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देशभर में कई मुगलकालीन मस्जिदें और मकबरे हैं, जो अपनी वास्तुकला, नक्काशी और इतिहास के लिए जाने जाते हैं
 
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आज हम आपको मध्य प्रदेश के प्राचीन शहर बुरहानपुर की शाही जामा मस्जिद के बारे में बताएंगे 
 
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बुरहानपुर को बादशाह 'नासिरउद्दीन फ़ारूक़ी' ने 1406 ई. में बसाया था। फ़ारूक़ी शासनकाल में यहां अनेक इमारतें और मस्जिदें बनाई गई थीं
 
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उस दौर की सर्वश्रेष्ठ इमारतों में जामा मस्जिद पहले पायदान पर है, जो अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है
 
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जामा मस्जिद का निर्माण आदिलशाह फ़ारूक़ी ने कराया था। इसे बनाने में करीब 5 साल का वक्त लगा था
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बुरहानपुर की मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद की तरह बनाई गई है। इसके चारों तरफ़ दुकानें और चौक है, जहां काफ़ी चहल-पहल रहती है
 
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मस्जिद निर्माण में 'संगेखारा' पत्थरों का उपयोग किया गया है, उस दौर में इन विशेष पत्थरों को मांडवगढ़ की पहाड़ियों से मंगवाया गया था
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मस्जिद 15 शानदार कमानों पर आधारित हैं। मस्जिद में छत नहीं है बल्कि कमानें खुद ऊपर जाकर मस्जिद की छत का निर्माण करती हैं, देश में ऐसी छत कहीं और नहीं है
 
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मस्जिद के पास दो मीनारें बनी हैं, जिनकी ऊंचाई करीब 130 फीट है। मीनारों के ऊपर जाने के लिए चक्करदार सीढ़ियां बनाई गई हैं

 
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मस्जिद की लंबाई अंदर से 148 फीट और चौड़ाई 52 फीट है। यह इमारत 70 स्तंभों पर स्थित है, मस्जिद की दीवार करीब 5 फीट मोटी है
 
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मस्जिद की लम्बाई में 5 दालान और चौड़ाई में 15 दालान हैं। लम्बाई वाले प्रत्येक दालान में 500 लोग आसानी से नमाज़ पढ़ सकते हैं
 
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मस्जिद के मुख्य दरवाजे की ऊंचाई लगभग 25 फ़ीट है। पत्थरों से बने इस दरवाजे की छत पर बेल-बूटों की सुंदर चित्रकारी है
 
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बुरहानपुर की जामा मस्जिद भारत की एकमात्र मस्जिद है, जिसमें दो प्राचीन भाषाओं में शिलालेख हैं। यहां अरबी में लिखी आयतों का संस्कृत भाषा में अनुवाद लिखा है
 
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बुरहानपुर की जामा मस्जिद में करीब 450 साल पुरानी सऊदी अरब से लाई गई तस्बीह मौजूद है, लकड़ी के 1001 मोतियों से बनी तस्बीह में कहीं जोड़ नहीं है
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इंदौर से बुरहानपुर की दूरी करीब 200 किमी है, रेल और सड़क मार्ग के जरिए यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है
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