अमर उजाला
Mon, 20 March 2023
कविता वक्तव्य नहीं गवाह है
कभी हमारे सामने, कभी हमसे पहले
कभी हमारे बाद
-कुंवर नारायण
अनुभव के नए-नए पृष्ठों पर
भाषा के समर्थन में बूँदें गिरती हैं
जैसे सामूहिक हस्ताक्षर अभियान में
आसमानी दस्तख़त।
~धूमिल
भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है
जो सड़क पर और है, संसद में और है
~धूमिल
कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है
~धूमिल
कविता विचारहीन नहीं हो सकती, परंतु विचारात्मक प्रतिबद्धता को मैं कविता के लिए अनिवार्य नहीं मानता।
~ केदारनाथ सिंह
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