Urdu Poetry: इमारत पर कहे शायरों के अल्फ़ाज़

Urdu Poetry: इमारत पर कहे शायरों के अल्फ़ाज़  

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कभी कभी कोई इंसान ऐसा लगता है
पुराने शहर में जैसे नई इमारत है
- बशीर बद्र 

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क्यूँ तिरे साथ रहीं उम्र बसर होने तक
हम न देखेंगे इमारत को खंडर होने तक
- रहमान फ़ारिस 

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ख़ूबसूरत है सिर्फ़ बाहर से
ये इमारत भी आदमी सी है
- अज़हर नवाज़ 

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अब जहाँ तेरी इमारत की हदें मिलती हैं
एक बुढ़िया का मकाँ था उसी जागीर के साथ
- सलीम कौसर 

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ऐसी कोई अजीब इमारत थी ज़िंदगी
बाहर से झाँकता रहा अंदर नहीं गया
- मुज़फ़्फ़र वारसी 

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