Urdu Poetry: 'घर' के लिए शायरों के अल्फ़ाज़
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
- अहमद फ़राज़
कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है
- जौन एलिया
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
- मिर्ज़ा ग़ालिब
उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
- निदा फ़ाज़ली
कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
- अहमद फ़राज़
Urdu Poetry: आज के चुनिंदा शेर