Urdu Poetry: खिड़की पर चुनिंदा शेर
सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
- नासिर काज़मी
नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही
ये खिड़की खोलो ज़रा सुब्ह की हवा ही लगे
- बशीर बद्र
खिड़की में कटी हैं सब रातें
कुछ चौरस थीं कुछ गोल कभी
- गुलज़ार
लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है
एक खिड़की तिरी आमद की दुआ करती है
- अब्बास क़मर
खिड़की खोल के देख तो बाहर
देर से कोई शख़्स खड़ा है
- नासिर काज़मी
Labour Day: मज़दूरों पर कहे शेर