अमर उजाला काव्य डेस्क
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
- बशीर बद्र
कश्ती को ख़ुदा पर छोड़ भी दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए
- बहज़ाद लखनवी
मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे
- तहज़ीब हाफ़ी
सितारा ही नहीं जब साथ देता
तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से
- परवीन शाकिर
वही टूटी हुई कश्ती है अपनी
वही ठहरा हुआ दरिया हमारा
- अहमद मुश्ताक़
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