Urdu Poetry: शजर यानी पेड़ पर चुनिंदा शेर
बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता
- जावेद अख़्तर
वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था
साए फैला के शजर क्या करते
- परवीन शाकिर
इक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ
ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ
- तहज़ीब हाफ़ी
वो घड़ी-दो-घड़ी जहाँ बैठे
वो ज़मीं महके वो शजर महके
- नवाज़ देवबंदी
तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द
- फ़रहत अब्बास शाह
Urdu Poetry: मौसम के मिज़ाज पर शायरों के अल्फ़ाज़