अमर उजाला काव्य डेस्क
एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है
धूप आँगन में फैल जाती है
- जौन एलिया
जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
- शकील बदायूंनी
थी जो इक फ़ाख़्ता उदास उदास
सुब्ह वो शाख़ से उड़ी ही नहीं
- जौन एलिया
इन अंधेरों से परे इस शब-ए-ग़म से आगे
इक नई सुब्ह भी है शाम-ए-अलम से आगे
- इशरत क़ादरी
Urdu Poetry: अलग-अलग शहरों पर शायरों के अल्फ़ाज़