Urdu Poetry: परिंदों के लिए शायरों के अल्फ़ाज़

अमर उजाला काव्य डेस्क

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इक परिंदा अभी उड़ान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है
- अमीर क़ज़लबाश 

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निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा
अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है
- उमैर नजमी

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शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है
लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है
- फ़हीम जोगापुरी

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खुली हवाओं में उड़ना तो उस की फ़ितरत है
परिंदा क्यूँ किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए
- वसीम बरेलवी

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उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है
परिंदा शाम के पुल पर बहुत ख़ामोश बैठा है
- बशीर बद्र

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