Urdu Poetry: 'किताबों' पर कहे शेर

Urdu Poetry: 'किताबों' पर कहे शेर 

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यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
- बशीर बद्र 

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काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
- बशीर बद्र 

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वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है
उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं
- राहत इंदौरी 

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कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए
- अंजुम रहबर 

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अना-परस्त है इतना कि बात से पहले
वो उठ के बंद मिरी हर किताब कर देगा
- परवीन शाकिर 

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Urdu Poetry: भरोसे पर कहे शेर

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