Urdu Poetry: रूठे हुए रिश्तों को मनाएं इन शेर के साथ

अमर उजाला काव्य डेस्क

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जिस में जितना ज़र्फ़ था उस ने वो दिखा दिया
मेरी बात मान जा तल्ख़ियों को भूल जा
- दानिश अज़ीज़

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मस्लहत का यही तक़ाज़ा है
वो न मानें तो मान जाओ तुम
- आतिश बहावलपुरी

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बारहा दिल तोड़ना अच्छा नहीं
मान जाओ रूठना अच्छा नहीं
- समीना साक़िब

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बस अब मोहब्बत से हाथ उठाओ भले को कहते हैं मान जाओ
न आप को इस तरह मिटाओ 'जलील' देखो तो हाल क्या है
- जलील मानिकपुरी

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Urdu Poetry: सबसे ज़रूरी बात? किताब

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