अमर उजाला काव्य डेस्क
जाड़े ओढ़ के सो जाने में
कब कोई ज़हमत होती है
- इशरत आफ़रीं
हर एक शाख़ से जाड़े की बर्फ़ लिपटी है
अभी दरख़्त पे पत्तों की शाल थोड़ी है
- नवाज़ असीमी
गर्मी में टिन की छत ने जलाया कुछ और भी
जाड़े में बर्फ़ सर पे गिरी साएबान से
- वली आलम शाहीन
तू वो है आतिश का परकाला कि तेरे सामने
आफ़्ताब आ कर कहे जाड़े से थर्राता हूँ मैं
- इमाम बख़्श नासिख़
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