अमर उजाला काव्य डेस्क
भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब
कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है
- अहमद फ़राज़
फ़स्ल-ए-गुल में बहार पहला गुलाब
किस की ज़ुल्फ़ों में टाँकती है अभी
- अहमद फ़राज़
नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं
ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे
- बशीर बद्र
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
- मीर तक़ी मीर
Ammar Iqbal Poetry: नए ज़माने के मशहूर शायर के चुनिंदा अशआर