Urdu Poetry: मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

अमर उजाला काव्य डेस्क  

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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
- मिर्ज़ा ग़ालिब 

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ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया
- शकील बदायूंनी

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तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे
- अहमद फ़राज़ 

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मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे
- हफ़ीज़ होशियारपुरी 

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मैं तिरे साथ सितारों से गुज़र सकता हूँ
कितना आसान मोहब्बत का सफ़र लगता है
- बशीर बद्र 

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