Urdu Poetry: उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
- जिगर मुरादाबादी 

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की मोहब्बत तो सियासत का चलन छोड़ दिया
हम अगर इश्क़ न करते तो हुकूमत करते
- अज्ञात 

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मैं तो भोला-भाला 'वसीम' और वो फ़नकार सियासत का
उस के जब घटने की बारी आई मुझ को जोड़ लिया
- वसीम बरेलवी 

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कल सियासत में भी मोहब्बत थी
अब मोहब्बत में भी सियासत है
- ख़्वाजा साजिद 

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