अमर उजाला काव्य डेस्क
कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला
Urdu Shayari: सर्दियों पर चुनिंदा शेर