अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से
- एहतिशाम अख्तर
सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या
- हफ़ीज़ बनारसी
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
- जाँ निसार अख़्तर
राहों में जान घर में चराग़ों से शान है
दीपावली से आज ज़मीन आसमान है
- ओबैद आज़म आज़मी
खिड़कियों से झाँकती है रौशनी
बत्तियाँ जलती हैं घर घर रात में
- मोहम्मद अल्वी
मैं रौशनी पे ज़िंदगी का नाम लिख के आ गया
उसे मिटा मिटा के ये सियाह रात थक गई
- नसीम अंसारी
Urdu Poetry: जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा