Rose Day Shayari: मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ
वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता
- अफ़ज़ल इलाहाबादी 

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भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब
कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है
- अहमद फ़राज़

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सुनो कि अब हम गुलाब देंगे गुलाब लेंगे
मोहब्बतों में कोई ख़सारा नहीं चलेगा
- जावेद अनवर 

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सुनो कि अब हम गुलाब देंगे गुलाब लेंगे
मोहब्बतों में कोई ख़सारा नहीं चलेगा
- जावेद अनवर

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उसे किसी से मोहब्बत न थी मगर उस ने
गुलाब तोड़ के दुनिया को शक में डाल दिया
- दिलावर अली आज़र

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तिरे बदन की महक को गुलाब से तश्बीह
कि जैसे कोई दिखाए चराग़ सूरज को
- मारूफ़ रायबरेलवी

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Urdu Poetry: पता अब तक नहीं बदला हमारा

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