Munawwar Rana Shayari: मुनव्वर राना के चुनिंदा शेर

अमर उजाला

Mon, 15 January 2024

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मुनव्वर माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना 
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती 

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फ़रिश्ते आ कर उन के जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं 
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं 
 
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तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता 
तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हम ने 

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तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको 
तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है 
 
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तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते 
हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं 
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हँस के मिलता है मगर काफ़ी थकी लगती हैं 
उस की आँखें कई सदियों की जगी लगती हैं 

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Urdu Poetry: वे शेर जो दुनिया के नाम कह दिए गए

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