अमर उजाला
Mon, 25 November 2024
डर है न दुपट्टा कहीं सीने से सरक जाए
पंखा भी हमें पास से झलने नहीं देते
~रियाज़ ख़ैराबादी
कुछ मोहब्बत को न था चैन से रखना मंज़ूर
और कुछ उन की इनायात ने जीने न दिया
~ कैफ़ भोपाली
हम बंद किए आँख तसव्वुर में पड़े हैं
ऐसे में कोई छम से जो आ जाए तो क्या हो
~रियाज़ ख़ैराबादी
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
~ ख़ुमार बाराबंकवी
Urdu Poetry: कैसा जादू है समझ आता नहीं, नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के