अमर उजाला काव्य डेस्क
तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है
मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो
- ताहिर फ़राज़
ये कैसा क़ाफ़िला है जिस में सारे लोग तन्हा हैं
ये किस बर्ज़ख़ में हैं हम सब तुम्हें भी सोचना होगा
- हिमायत अली शाएर
बड़े बा-वफ़ा थे मिरे यार सब
मुसीबत में जब तक पुकारा न था
- सदा अम्बालवी
जम्अ करती है मुझे रात बहुत मुश्किल से
सुब्ह को घर से निकलते ही बिखरने के लिए
- जावेद शाहीन
भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
- सबा अकबराबादी
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