अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने
उस गली ने ये सुन के सब्र किया
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं
ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को
अपने अंदाज़ से गँवाने का
याद उसे इंतिहाई करते हैं
सो हम उस की बुराई करते हैं
उर्दू शायरी: सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं