अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से हैं
-मुनीर नियाज़ी
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
- असरार-उल-हक़ मजाज़
तू आग में ऐ औरत ज़िंदा भी जली बरसों
साँचे में हर इक ग़म के चुप-चाप ढली बरसों
- हबीब जालिब
अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता
वो देखो एक औरत आ रही है
- शकील जमाली
Urdu Poetry: अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे