अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बहार आई कि दिन होली के आए
गुलों में रंग खेला जा रहा है
- जलील मानिकपुरी
यूँ रुख़-ए-ज़र्द चमक उठता है आने पे तिरे
जैसे होली में कोई मल के गुलाल आता है
- चरख़ चिन्योटी
अब के होली पे लगा रंग उतरता ही नहीं
किस ने इस बार हमें रंग लगाया हुआ है
- ज़िया ज़मीर
सजनी की आँखों में छुप कर जब झाँका
बिन होली खेले ही साजन भीग गया
- मुसव्विर सब्ज़वारी
Urdu Poetry: ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था