अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सजनी की आँखों में छुप कर जब झाँका
बिन होली खेले ही साजन भीग गया
- मुसव्विर सब्ज़वारी
मुँह पर नक़ाब-ए-ज़र्द हर इक ज़ुल्फ़ पर गुलाल
होली की शाम ही तो सहर है बसंत की
- लाला माधव राम जौहर
मौसम-ए-होली है दिन आए हैं रंग और राग के
हम से तुम कुछ माँगने आओ बहाने फाग के
- मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
पूरा करेंगे होली में क्या वादा-ए-विसाल
जिन को अभी बसंत की ऐ दिल ख़बर नहीं
- कल्ब-ए-हुसैन नादिर
Urdu Poetry: तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे