अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने
- मेराज फ़ैज़ाबादी
उन के होने से बख़्त होते हैं
बाप घर के दरख़्त होते हैं
- अज्ञात
सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की
- हम्माद नियाज़ी
बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं
और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
Urdu Poetry: हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है