Fathers Day 2024: पिता के लिए कहे शेर

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली    

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हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब 
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने 
- मेराज फ़ैज़ाबादी

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उन के होने से बख़्त होते हैं 
बाप घर के दरख़्त होते हैं 
- अज्ञात 

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सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है 
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की 
- हम्माद नियाज़ी

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बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं
और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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Urdu Poetry: हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

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