Urdu Poetry: अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
- मिर्ज़ा ग़ालिब 

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तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता
- मोमिन ख़ाँ मोमिन 

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बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में
आबले पड़ गए ज़बान में क्या
- जौन एलिया 

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मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
ख़मोशी भी है ये आवाज़ भी है
- अर्श मलसियानी

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Urdu Poetry: शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे

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