अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
- दाग़ देहलवी
वो कहते हैं मैं ज़िंदगानी हूँ तेरी
ये सच है तो उन का भरोसा नहीं है
- आसी ग़ाज़ीपुरी
कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की
- बशीर बद्र
रस्ता भी हमी लोग थे राही भी हमीं थे
और अपनी मसाफ़त की गवाही भी हमीं थे
- नसीम सिद्दीक़ी
Urdu Poetry: इतने मायूस तो हालात नहीं, लोग किस वास्ते घबराए हैं